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Rights and Responsibilities of Shareholders |शेयरहोल्डरों के अधिकार और उत्तरदायित्व |

Rights and Responsibilities of Shareholders |शेयरहोल्डरों के अधिकार और उत्तरदायित्व |

कम्पनी की अपनी अलग कानूनी हस्ती होती है – शेयरहोल्डरों से अलग । इसका अर्थ है कि शेयरहोल्डरों को किसी भी प्रकार सम्बद्ध किये बिना कम्पनी व्यापारी समझौते कर सकती है , प्रॉपर्टी खरीद या बेच सकती है , कानूनी कार्यवाही कर सकती है , और कर्ज उठा सकती है । कम्पनी , डायरेक्टरों , या कम्पनी में काम करने वाले लोगों के किसी भी काम के लिए शेयरहोल्डरों को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । शेयरहोल्डर की जिम्मेदारी सिर्फ उस कम्पनी में उसके शेयरों के मूल्य तक ही सीमित होती है । यह सिर्फ एक आर्थिक जिम्मेदारी है , जो शेयर खरीदने पर पूरी हो जाती है । मान लीजिए आपने क , ख , ग , लिमिटेड कम्पनी में 10 रूपये प्रति शेयर के मूल्य पर 100 शेयर खरीदे । तब कम्पनी के प्रति आपकी आर्थिक जिम्मेदारी 1000 रूपये है – जो इन शेयरों को खरीदने पर पूरी हो जाएगी । इसके बाद अगर कम्पनी दीवालिया घोषित हो जाती है , तो ज्यादा से । ज्यादा शेयर बाजार में आपके शेयरों का भाव शून्य तक गिर जाने पर आप अपने 1000 रूपये से हाथ धो बैठेंगे । पर किसी भी स्थिति में आपको कम्पनी या उसके कर्जदारों को कोई पैसा देने के लिए नहीं कहा जा सकता ।

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इस नियम को सीमित जिम्मेदारी , या लिमिटेड लायबिलिटी ‘ कहा जाता है । हर कम्पनी को अपने नाम के आगे ‘ लिमिटेड ‘ शब्द का प्रयोग करना कानूनन ज़रूरी है । इससे पता चलता है कि उसके शेयरहोल्डरों की आर्थिक जिम्मेदारी सीमित है । इसलिए जब आप किसी कम्पनी के शेयर खरीदें तो आप निश्चिंत रह सकते हैं कि आप किसी भी तरह उस कम्पनी की आर्थिक या कानूनी परेशानियों से सम्बन्धित नहीं है.

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शेयरहोल्डर होने के नाते आप अपने शेयर किसी और को बेच कर उन्हें कम्पनी में अपने सभी अधिकार सौंप सकते हैं । शेयर चल सम्पत्ति ( Movable Property ) होते हैं , जिन्हें खरीदना , बेचना , भेटस्वरूप देना , वसीयत के जरिये देना , अथवा अन्य कानूनी तरीकों से किसी को सौंपना संभव होता है । कम्पनी की अपनी स्वाधीन हस्ती होने के कारण शेयरहोल्डर रूपी मालिकों के बदलने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता । । शुरू में जब कम्पनी का संगठन होता है तब उसके शेयरों के ‘ अंकित मूल्य ‘ ( Face Value ) के अनुसार सीधे कम्पनी को पैसे देकर इन शेयरों को खरीदा जा सकता है । इसी से कम्पनी का शुरूआती । मूलधन आता है । उसके बाद शेयर बाजार में होने वाले सौदों से कम्पनी पर कोई असर नहीं पड़ता ।

उदाहरण के लिए , अगर किसी कम्पनी का 10 रूपये में जारी किया गया शेयर , बाजार में 3000 रूपये प्रति शेयर के भाव से बिक रहा है , तो इसका अर्थ यह नहीं है कि कम्पनी पहले से 300 गुणा अधिक सम्पन्न हो गयी है । इसका अर्थ केवल यह है कि बाजार में शेयर के खरीदार कम्पनी को अच्छा मान रहे हैं तथा निवेशक उसके शेयर को 3000 रूपये में खरीदने को तैयार हैं ।

source:(s s grawal)

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