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Government banks may be the next star performers of the stock market

Government banks may be the next star performers of the stock market (सरकारी बैंक शेयर बाजार के अगले स्टार परफॉर्मर हो सकते हैं):

PSU banks may be the next star performers of the stock market says Jimit Modi | नई दिल्ली. सरकारी बैंकों के शेयर करीब 3 साल से सुस्त पड़े हैं। इस साल निफ्टी का पीएसयू बैंक इंडेक्स 20% गिरा है। एनपीए इसका सबसे बड़ा कारण है।

नई दिल्ली. सरकारी बैंकों के शेयर करीब 3 साल से सुस्त पड़े हैं। इस साल निफ्टी का पीएसयू बैंक इंडेक्स 20% गिरा है। एनपीए इसका सबसे बड़ा कारण है। सरकार और रिजर्व बैंक ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे इन बैंकों की सेहत आने वाले दिनों में सुधरेगी। 5 साल की अवधि में ये बैंक स्टार परफॉर्मर बन सकते हैं। यहां इसके कुछ प्रमुख कारण दिए जा रहे हैं। 

Bankrupt law (दिवालिया कानून): पहले कर्ज लेने वाले बैंकों पर हावी रहते थे। इस कानून के बाद बैंकों का नियंत्रण रहता है। एनपीए के समाधान के लिए पहले भी कई उपाय किए गए। लेकिन लंबा समय लगने के बावजूद बैंकों को कुछ खास मिलता नहीं था।

सरकारी बैंक इसके शिकार हुए। आईबीसी जैसे कानून से प्रमोटर कंपनी पर अपना नियंत्रण खोने के डर से कर्ज लौटाने में गंभीर हुए हैं। 

Employee Stock Option (एंप्लॉयी स्टॉक ऑप्शन) (इसोप): बैंक कर्मचारियों को इसोप देने की योजना अच्छी है। इससे कर्मचारियों में जिम्मेदारी और जवाबदेही बढ़ेगी। वे बेहतर सर्विस देने के लिए प्रेरित होंगे। इलाहाबाद, सिंडिकेट बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक इसोप जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। 

Improvement in corporate governance (कॉरपोरेट गवर्नेंस में सुधार): एनपीए बढ़ने की एक बड़ी वजह थी खराब कॉरपोरेट गवर्नेंस। बैंकों ने बिना पूरी जांच-पड़ताल किए कर्ज दिया। बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस के कारण ही निजी क्षेत्र के बैंकों में एनपीए कम है। फैसले लेने की प्रक्रिया पारदर्शी बनाने और बाहरी सीईओ नियुक्त करने से बैंकों के कामकाज में सुधार होगा। 

Government support (सरकार का समर्थन): सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह बैंकिंग सिस्टम में नकदी बनाए रखेगी। इसके लिए वह 4 महीने में बैंकों में 42,000 करोड रुपए की पूंजी डालेगी। हाल के दिनों में बैंकों में नकदी की जो समस्या आई है, इससे वह काफी हद तक कम हो जाएगी। 

Softening by the Reserve Bank(रिजर्व बैंक द्वारा नरमी): सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हाल की बातचीत से लगता है कि कमजोर बैंकों के लिए तत्काल सुधार (पीसीए) के नियम आसान होंगे। अभी 11 सरकारी बैंक पीसीए श्रेणी में हैं। नियम आसान होने पर ये नया कर्ज दे सकेंगे। 

Il&fs default (आईएलएंडएफएस का डिफॉल्ट): इस संकट से पहले एनबीएफसी काफी तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उन्हें कॉमर्शियल पेपर के जरिए बहुत कम ब्याज पर कर्ज मिल रहा था। लेकिन डिफॉल्ट के बाद नकदी संकट उभरने से कॉमर्शियल पेपर काम हो गए हैं। इसका फायदा सरकारी बैंकों को मिलेगा, क्योंकि उनके लिए फंड की लागत एनबीएफसी से कम होती है। इससे भी उन्हें अपना मार्केट दोबारा हासिल करने में मदद मिलेगी। 

Economy improvement(इकोनॉमी में बेहतरी): कई ऐसे संकेत हैं जिनसे इकोनॉमी में रिकवरी के संकेत मिलते हैं। बैंक कर्ज की ग्रोथ 6% से बढ़कर 15% हो गई है। मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई नवंबर में 54 दर्ज हुआ है जो एक साल में सबसे ज्यादा है। रिकवरी को देखते हुए कंपनियां नया निवेश कर रही हैं। इसी वजह से बैंकों के कर्ज की ग्रोथ ढाई गुना हो गई है। 

Increasing the share of formal sector औपचारिक क्षेत्र के हिस्सेदारी बढ़ना: जन-धन जैसी स्कीमों के जरिए सरकार की कोशिश है कि लोग बचत का पैसा बैंकों में रखें। यह बैंकों के लिए अच्छा है। इससे ग्रामीण इलाकों में बचत बढ़ेगी और वहां सरकारी बैंक ही ज्यादा हैं। जीएसटी से भी इकोनॉमी में औपचारिक क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है। 

इन उपायों से सरकारी बैंकों की स्थिति सुधरेगी। हालांकि कई विशेषज्ञों को लगता है कि इसका प्रदर्शन नहीं सुधरेगा। इसलिए इनमें निवेश में जोखिम है। मेरे विचार से ऐसे वक्त में आंत्रप्रेन्योर-निवेशक रॉबर्ट एर्नोट की बात ध्यान में रखनी चाहिए। उन्होंने कहा था- निवेश में जो आसान होता है, उसमें मुनाफा नहीं होता। सरकारी बैंकों के शेयर बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हैं। इनका औसत पीबी (प्राइस-बुक वैल्यू रेशियो) 0.67 है, जबकि निजी बैंकों का 2.39 है। यह डिस्काउंट 5 साल में निवेशकों को अच्छा रिटर्न दे सकता है। 

source:
(ये लेखक के निजी विचार हैं। इनके आधार पर निवेश से नुकसान के लिए दैनिक भास्कर जिम्मेदार नहीं होगा।)

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